Oct 23, 2008

रोटी, दवा, दारु और चाँद !

दृश्य १:

एक ग्रामीण सरकारी प्राथमिक चिकित्सा केन्द्र में एक बच्चा... हड्डी का ढांचा, शायद मांस उनके लिए नहीं होता. पता नहीं सो रहा है या बेहोश है. सरकारी ग्लूकोज की बोतल लगी हुई है... बाप बगल में बैठा है, देखने से तो नहीं लगता कि दो दिन से कुछ खाया होगा.

'आप इसे शाम को घर ले जाइए... ठीक हो जायेगा. मैं दवाई लिख देता हूँ. '
फिर कुछ सोच कर बोला 'आप फिलहाल इसे सुबह-शाम २-२ रोटी खिलाइए और फिर धीरे-धीरे बढ़ाना है २ से ३... ४ तक. '
'रोटी? डॉक्टर साहब कोई सस्ती दवा नहीं मिल सकती?'
भले अजीब लगे लेकिन शायद डॉक्टर को ये सुनने की आदत हो*, बोला 'दारु पीते हो?'
'हाँ साहब कभी-कभी !'
'उसी पैसे से रोटी नहीं खिला सकते?'
'रोज नहीं पीता साहब... जिस दिन पीता हूँ उस दिन तो रोटी के लिए भी बच जाता है...'
'तो उस दिन पीने के बजाय बचा के नहीं रख सकते?'
वो चुप हो गया और उसी के साथ वहां बैठे लोगों का दया-भाव जाता रहा...

दृश्य २:

उसी गाँव का एक छत, रात के १० बजे. शायद इतनी हसीन चाँदनी रात पहले नहीं देखी... शरद ऋतू, चाँद और तारे. क्या ऐसी भी रात होती है? लगा जैसे चाँद को तो भूल ही गया था ! सालों बात सप्तर्षि और फिर ध्रुव देखा... एक बारगी लगा... काश ये बिजली नहीं होती और रोज ऐसी ही रात होती... चाँद ना बढ़ता न घटता बस ऐसा ही रहता, वक़्त थम जाए जैसी बात. (शायद बहुत दिनों के बाद ऐसी रात देखकर कल्पना शक्ति जाती रही कि इससे अच्छी भी रात होती होगी और असल में तो ऐसा रोज ही होता है !)

_ _

दारु सुनते ही फेर लिया जो मुंह,
कभी सोचा क्यों पीता हूँ ?
मेरे लिए रोटी का टुकडा चाँद जैसा होता है !
पर तुम्हारे चाँद की तरह नहीं,
ये असली चाँद है !
बिजली से नहीं चलता...
और घटता-बढ़ता भी है !
_ _

*उस समाज में लोग कुछ भी करते हैं, अगले दिन अखबार में पढ़ा... लोगों ने उस डॉक्टर की पिटाई कर दी. आरोप: 'उसने एक साँप काटे हुए आदमी का इलाज ढंग से नहीं किया जिससे उसकी मृत्यु हो गई'. लोगों की हालात का वैसे ही नहीं पता जैसे उस गरीब के पीने का कारण। हाँ वो डॉक्टर अगर कर सकता तो जरूर इलाज करता। बहुत फर्क है इंडिया और भारत में... दोनों के सोच में भी. वैसे सोच को पैदा करने में हालात का बहुत बड़ा हाथ होता है.

~Abhishek Ojha~

27 टिप्पणियाँ:

अभिषेक ओझा उवाच

*आज सुबह से ब्लौगर में कुछ समस्या आ जाने से कमेन्ट बॉक्स नहीं खुल पा रहा था.


रंजना भाटिया जी की ईमेल टिपण्णी:

सही में बहुत फर्क है इंडिया और भारत में ....

मेरे लिए रोटी का टुकडा चाँद जैसा होता है !
पर तुम्हारे चाँद की तरह नहीं,
ये असली चाँद है...
तब भी निकलता है जब बिजली होती है...
और घटता-बढ़ता भी है !

बहुत कुछ कह गई यह पंक्तियाँ ...

महेन उवाच

हाँ फ़र्क तो है।

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi उवाच

हालात समझने भी होंगे और बदलने के रास्ते भी तलाश करने होंगे।

कुश एक खूबसूरत ख्याल उवाच

"बहुत फर्क है इंडिया और भारत में.."

बिल्कुल सही कहा अभिषेक भाई.. उपर जो डॉक्टर और मरीज का संवाद आपने लिखा है वही तो त्रासदी है.. पता नही कब हालत ठीक होंगे...

डॉ .अनुराग उवाच

कभी एक post likhi थी अभिषेक शायद तुमने पढ़ी हो ....दया नाम से ...उसे पढ़कर कुछ लोगो को मंटो की कहानी याद आई थी .......उसके बाद मैंने दूसरी पोस्ट लिखी थी ..जिंदगी मंटो की कहानी से भी बेरहम होती है.....
मंटो कौन ? अश्लील कहानी लिखने वाला ये नामुराद लेखक इस सदी की विलुप्त होती प्रजातियों में से एक है .... लेकिन जिंदगी मंटो की कहानी से भी बेरहम होती है , ये उसूलो को तो खाती ही है दुःख दर्द ओर उम्मीद भी चबा चबा कर बिना थूक सटके निगल जाती है ,दया का बाप जब अपनी बाकी की तीन बच्चियों का भविष्य 'मुआवजे "की उस रकम में देखता है .जो केस दायर ना करने के एवेज में उसी दी गयी थी ....तो महीनो दया को इसी "सामान्य जिंदगी ' में लाने के लिए जूझती psychitry विभाग की फिमेल रेसिडेंट कही भीतर से टूट जाती है . सच की इस विकृत दुनिया के बीमार समाज का इलाज उसके पास नही है .
समाज भले ही दो हिस्सों (अमीर ओर गरीब )में बँटा हो पर इसका पाटा हर हिस्से औरत को ही पीसेगा ?
जब किसी जयंती बेन का शराबी पति उसे डंडो से अधमरा करता है ओर उसके ५ महीने बच्चे को लेकर उसकी बूढी सास अस्पताल आती है तो आप् का मन करता है की उसके शराबी पति को लात घूंसों से मर कर अधमरा कर दूँ ..आप् शायद एक दो बार ऐसा कर भी दे पर जब हर हफ्ते कोई जयंती बेन आती है तो आप् उसके घावो को खामोशी से स्टिच करते है साल दर साल आपकी खामोशी बढती जाती है ओर आपके हाथो की सफाई भी . अब आप बिना दर्द किये तेजी से स्टिच करना सीख जाते है ,लिजलिजे शराबी से आपको घ्रणा तो होती है पर आप अपनी घ्रणा को दबाना सीख जाते है . शुरू में आप ऐसा कभी करते भी है तो यही जयंती बेन अपने पति को बचाने पट्टियों से लदी सामने आ जाती है …. महान औरत ?देवी ?ये कौन से संस्कार के बीज है जो सिर्फ़ औरतो के जिस्म में उगते है ,पलते है ? भूखे जिस्मो में भी ?
दस साल बीत गये है पर शायद दया अब भी सरकारी अस्पतालों में दिख जाती होगी, कभी उम्र बदल कर ,कभी चेहरा ..


अब मै अपनी दूसरी पोस्ट का जिक्र करता हूँ....कुछ ऐसी मजबूरिया जिससे मुझ जैसे पेशेवर लोगो को रोज रूबरू होना पड़ता है ...कल एक ५० साल कि महिला अपने पति के साथ दयनीय हालत मे मेरे पास इलाज के लिए ,जिसकी हालत भरती होने जैसी थी ओर जिसे कुछ दवाईयों कि सख्त जरुरत थी ...उनसे बात करके ही मुझे आभास हुआ कि उनके बस मे खर्चा उठाना नही है ....वो पहले २ किलोमीटर पैदल चल कर एक जगह पहुँचते है ओर फ़िर वहां बस का इंतज़ार करते है जो एक घंटे तक का होता है ,उसके बाद ४० किलोमीटर का सफर करके मेरठ के किसी बस अड्डे पर उतर कर वहां से रिक्शा लेकर मेरे पास आते है ...हमारे यहाँ भीषण गर्मी पड़नी शुरू हो गई है ,मैं दोपहर मे ८ किलोमीटर के सफर मे अपनी गाड़ी का ऐ ।सी चला देता हूँ...किसी गाँव के सो कॉल्ड डोक्टर ने उन्हें बेवजह के इंजेक्शन लगाये हुए है ,कुछ दर्द ओर गोलिया वो अपने आप लेकर खाती रही है ...मैं विवश हो जाता हूँ ....उन्हें ढेर सारी दवाईयों कि जरुरत है ,जो सबसे ज्यादा जरूरी है वही लिखूं,?अपनी दराज टटोलता हूँ ..कुछ दवाये है ,जो उन्हें दी जा सकती है ,पर उन्हें ५ दिन बाद दिखाना पड़ेगा ,उनके कुछ खून कि जांच कि जरुरत है .....वो तो मुफ्त मे नही हो सकती ? मैं अपनी फीस भी वापस कर दूँ तो भी उनके पास इतने पैसे है कि वो २ दिन कि दवाई खरीद सकते है ........बीमारी अमीर -गरीब,हिंदू मुसलमान ,या किसी जात को नही देखती .....ऐसा कई बार होता है रोज होता है ,कई बार मेरी दराज मे वाही दावा नही मिलती जो किसी जरुरत मंद को चाहिए ? तो ?क्या हिन्दुस्तान के इन्सान कि प्रतिरोधक शमता इश्वर ने ज्यादा दी है ? एक सुबह एक ऐसे बूढे बाबा मेरे क्लिनिक पर अपनी पत्नी को लेकर आए जिनसे प्यार से बात करने पर ही उनकी आँखे भर आई ,उनके बेटे उनकी देखभाल नही कर रहे थे ,किसी तरह मेरी फीस के पैसे जुटाकर आए ...चलिए मैंने फीस वापस कर दी पर कल ?परसों ? उसके बाद ?अगर उन्हें कोई ओर बीमारी हुई ?मुफलिसी के इस कीटाणु से कौन लड़ेगा ? कौन इन हालात का हिसाब लिख रहा है ?चित्रगुप्त ?या किसी ओर धर्म का कोई ओर ? क्या आपने किसी मजदूर को कभी रुक कर देखा है ? क्या वजह है हम ऐ.सी मे बैठकर ब्रांडेड शर्ट ओर पेंट पहनकर अपने लेप-टॉप पर प्यार-मोहब्बत कि कविताएं लिखते है ओर अपने गुजरे दिनों को याद करते हुए कोल्ड ड्रिंक ओर चिप्स मे उतनी ही पैसे खर्च कर देते है जितने वो पुरा दिन धुप ओर मिटटी मे झुझते हुए कमाता है ? फर्ज कीजेये कि वो आपकी जगह आपके घर मे पैदा हुआ होता ओर आप उसकी जगह उसके घर मे .....तो क्या समीकरण उल्टे नही होते ? पर ये समीकरण तय कौन करता है ?भगवान् ?खुदा ?कहाँ है ? क्या उसके पास कोई रजिस्टर है ?जो सबके गुनाहों का हिसाब लिख रहा है ?मेनटेन कर रहा है ?कही उसमे कोई गडबडी तो नही ?यदि सचमुच ऐसा हुआ तो ?डर लगता है ना सोचकर अपने गुनाहों के बारे मे ? मुझे यद् है एक बार किसी भरती मरीज के पति ने जब मुझे बताया की उसे अपनी पोस्ट ऑफिस की अफ .डी तुड़वा के हमे पैसे देने पडेगे तो साला इमोशनल मन फ़िर बावला हो उठा ओर मैंने जब उसके काफ़ी पैसे अपनी विसिट मे कम किए तो उसी शाम मेरे दूसरे डोक्टर दोस्त का फ़ोन आ गया "यार तुझे इतने पैसे एक दम कम नही करने चाहिए थे अब मुझ पर भी वो लोग दबाव डालेगे ओर मुझे आगे भी कई लोगो का हिसाब करना है ....सवाल ये नही की मैं महान हूँ ओर वो पैसे का लालची ,मैंने उसे कई मरीजो के लिए झूझते देखा है रात को उठ उठ कर भागते देखा है ,फीस छोड़ते देखा है .....पर यहाँ उसकी भी कुछ विवाश्ताये है ?उसकी ब्रांच मे भरती मरीज ज्यादा है .....तो फ़िर भगवान् ऐसा क्यों करता है जिस दिन एक मरीज की फीस छोड़ता हूँ दस मिनट के बाद ५ नए मरीज भेज देता है ......क्या ये उस मरीज का आशीर्वाद था जो भगवन के मोबाइल ने तुरंत सुन लिया ?कितने सवाल है ?या कभी लगता है उस मरीज कि फीस कम कर देनी चाहिए थी बेचारा गरीब था ...तो उस शाम को गाड़ी मे पंक्चर हो जाता है ?या कोई हेड लाइट फूंक जाती है ,या कोई ओर खर्चा हो जाता है .....लगभग उतना ही जितना मुझे लगा नही लेना चाहिए था ........क्या मैं अंधविश्वासी होता जा रहा हूँ ?आर्यसमाजी परिवार का होने के बावजूद ? पुलिस वाला फीस नही देना चाहता है ,मजिस्ट्रेट साहेब की बीवी बिना फीस दिए सबसे पहले कंसल्ट करना चाहती है ...जिनके पास पैसा है वो जान पहचान कि दुहाई देकर फीस से बचना चाह रहे है ....अन्दर आकर लगे हाथो वे भी साथ मे आए एक ओर इंसान कि एक ट्यूब लिखवाना चाह रहे है ....... .वही एक गरीब परिवार है जो सबकी फीस देकर अपने सारे बच्चो को दिखाता है .ओर सैम्पल कि दवाई मिलने पर मुझसे हिचकते हुए उसके दाम पूछता है .....कितने सवाल है जो रोज बिना वक़्त देखे जेहन का दरवाजा गाहे बगाहे खटखटा देते है ?कंचन जी कहना चाह रही है की क्यों इश्वर तुम्हारे दरवाजे पे आना जरूरी है ?उनकी कविता मे भी कुछ सवाल है . ....... क्या किसी ने उन बच्चो का नाम सुना है जो ठीक उसी वक़्त ओर उसी दिन पैदा हुए थे जिस दिन अनिल अम्बानी ......उनमे से कई शायद जीवित भी नही होगे ,कुछ बचपन मे ही बीमारी से मर गए होगे ?पर इसमे अनिल अम्बानी का कोई दोष नही है ?तो किस्मत इसी को कहते है ? मेरी कई मुश्किलें है मुझे ब्रांडेड कपड़े भी पहनने है ,लेटेस्ट मोबाइल भी चाहिए , लेटेस्ट कार भी ....मुझे अच्छा खाना भी खाना है ओर अपने बेटे के सभी शौंक पूरे करने है ,मेरा दिल गरीबो के लिए भी धड़कता है ओर मैं तारे ज़मीन पर देखकर फ़ुट फ़ुट कर चुप चाप हॉल मे रोता हूँ , मुझे मज्लूमे से हमदर्दी भी है ओर मयखाने से भी कोई शिकयत नही ,मुझे नज़मे भी अच्छी लगती है ओर दोस्त यार भी...........फ़िर भी ....... ऐसे कई सवाल रोज उठते है ,कुछ देर कलाबजिया मारते है फ़िर भागती दौड़ती जिंदगी कि जरूरतों कि भीड़ मे गुम हो जाते है ..... कभी ये पंक्तिया लिखी थी ,आज उन्हें दुहरा रहा हूँ......


"कितना लड़ ले मौलवी -पंडित
दो ही मजहब इस दुनिया के
एक अमीरी का दूजा गरीबी का "

Zakir Ali 'Rajneesh' उवाच

इंडिया और भारत को अच्छे ढंग से समझाया है।

ताऊ रामपुरिया उवाच

" वैसे सोच को पैदा करने में हालात का बहुत बड़ा हाथ होता है."
कितनी सटीक बात कही है आपने ? बहुत लाजवाब पोस्ट है ! शुभकामनाएं !
यहाँ पर डा. अनुराग जी की टिपणी से "
"कितना लड़ ले मौलवी -पंडित
दो ही मजहब इस दुनिया के
एक अमीरी का दूजा गरीबी का "
आपको भी बहुत धन्यवाद डाक्टर साहब ! आपकी यहाँ संदर्भित पोस्ट मैंने पढी थी !

कंचन सिंह चौहान उवाच

kya kahu.n ... bahut si roj ki sachchhiya.n... kuchh kahane ko hota hi nahi.

कंचन सिंह चौहान उवाच

vaise subah se teen blog khole har jagah ye peene pilane vaali baat hi hai...koi special festival hai kya...:) :) :) :)

जितेन्द़ भगत उवाच

सारी मुसीबत की जड़ यही चॉंद है जो घटता बढ़ता रहता है-
ये असली चाँद है !
बिजली से नहीं चलता...
और घटता-बढ़ता भी है !

अनुराग जी की बात, जो उन्होंने पोस्‍ट के माध्‍यम से कही, वह भी मन को वि‍चलि‍त कर जाती है।

Gyandutt Pandey उवाच

मैने तीन बार पढ़ा, कि कुछ सार्थक टिप्पणी कर सकूं।
लगता है आज सेंसिटीविटी आउट आप सिंक है।
कभी कभी ऐसा होता है। :(

राज भाटिय़ा उवाच

गालिब को महबुबा से मिलने के लिये फ़ुरस्त की इन्तजार थी,ओर नजीर की शायरी गरीबी के रोग से बीमार थी....
इस रोटी नामे पर नजीर का शेर...
पूछा किसी ने यह किसी कामिल फक़ीर से
यह महरो माह हक़ ने बनाए हैं काहे के
वह सुन के बोला बाबा, ख़ुदा तुम को ख़ैर दे
हम तो न चाँद समझें, न सूरज ही जानते
बाबा हमें तो ये नज़र आती हैं रोटियाँ.
अभिषेक भाई, बहुत ही गहरी बात कही है आप ने अपने लेख मै, ओर अनुराग जी ने भी... काश मेरे पास इतना होता कि मै सब के आंसू पोछ पाता.
बहुत दुख होता है ऎसे हालत देख कर, क्या करे???
धन्यवाद

समीर यादव उवाच

क्या बात है..!! मैं यहाँ ज्ञान जी के साथ हो गया हूँ. पहले आपने अभिषेक जी फ़िर उस पर डॉ अनुराग की टीप ने....!!! कुछ लिखने के लिए मन ही कर रहा ....वो कहते है कोई बेहतरीन चीज नज़र से गुजर जाये फ़िर और कुछ देखने का मन नहीं करता...आज समीर की यह एक टीप नजर न ही आए तो अच्छा.

pintu उवाच

sahi kaha abhishek bhai bahut fark hai india aor bharat me

Arvind Mishra उवाच

अभिषेक भाई ज्ञान जी ने तीन बार पढा और मैं दुबारा पढ़ पाने का साहस नहीं जुटा पा रहा !

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` उवाच

Baatein chaltee rahein,
Zindgi ki tarah,
Chand ugta rahega,
bhookh bhee khatee rahegee,
anginat, insaano ko !

Mired Mirage उवाच

लेख बहुत अच्छा लगा । बस यही कह सकती हूँ कि भूख एक ऐसी बीमारी है जिसका इलाज कोई भी डॉक्टर नहीं कर सकता ।
घुघूती बासूती

Dr. Nazar Mahmood उवाच

खूबसूरत रचना
दीपावली की हार्दिक शुबकामनाएं

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन उवाच

बहुत कुछ कह गयी आपकी पोस्ट और उससे भी कहीं अधिक मिला इन टिप्पणियों में.

निरन्तर - महेंद्र मिश्रा उवाच

खूबसूरत रचना दीपावली की हार्दिक शुबकामनाएं.

योगेन्द्र मौदगिल उवाच

Abhishek g
samvedansheel post
Dr. Anuraag bhi apni post doob kar likhte hain

khair

आपके परिवार, मित्रों एवं ब्लाग-मंडली को दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं
--YOGENDRA MOUDGIL N FAMILY

अजित वडनेरकर उवाच

बहुत संवेदनशील पोस्ट है...
कुछ भी कहना नहीं चाहूंगा। डॉ अनुराग की टिप्पणी भी इस पोस्ट की उपलब्धि है....शायद आपकी पोस्ट से भी ज्यादा शब्दों में अपनी बात कही है...मगर जो कहना चाहते हैं उस खाते में पहले से ही कई पोथियां लिखी जा चुकी है। व्यथा अपार है, संवेदना भी अपार बनी रहे।
उजास पर्व की अनंत मंगलकामनाएं....

seema gupta उवाच

दीप मल्लिका दीपावली - आपके परिवारजनों, मित्रों, स्नेहीजनों व शुभ चिंतकों के लिये सुख, समृद्धि, शांति व धन-वैभव दायक हो॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰ इसी कामना के साथ॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰ दीपावली एवं नव वर्ष की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं

BrijmohanShrivastava उवाच

यथार्थ के धरातल पर सजीव चित्रण

डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर उवाच

बहुत अच्छा है...... बधाई,
आपको, परिवार सहित दीपावली की शुभकामनायें......

ताऊ रामपुरिया उवाच

परिवार व इष्ट मित्रो सहित आपको दीपावली की बधाई एवं हार्दिक शुभकामनाएं !
पिछले समय जाने अनजाने आपको कोई कष्ट पहुंचाया हो तो उसके लिए क्षमा प्रार्थी हूँ !

भूतनाथ उवाच

आपकी सुख समृद्धि और उन्नति में निरंतर वृद्धि होती रहे !
दीप पर्व की हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं !