Nov 24, 2008

चिकन अलाफूस: खाया है कभी?

'चिकन आलाफूस नहीं है क्या मेनू मे?'

'नहीं सर '

'क्या? नहीं है? अरे यार फिर क्या खाएं? ! कैसा रेस्टोरेंट है... मैनेजर को बुलाओ'

'सर क्या हुआ?'

'ये चिकन आलाफूस क्यों नहीं है? हर रेस्टोरेंट मे मिलने लगा है आजकल तो'

'सर ये रेसिपी हमें पता नहीं... अगली बार पता करके जरूर शामिल कर लेंगे'

--

ये हम अक्सर करते...

बी आर चोपडा की फ़िल्म 'छोटी सी बात' मे इसका जिक्र आता है। हमारे हॉस्टल मे अंग्रेजी फिल्मों का ही बोलबाला रहता पर कुछ हिन्दी फिल्में बड़ी लोकप्रिय हुई जिनमें ये भी थी। कम बजट की लगने वाली सीधी-सादी मनोरंजक फ़िल्म. (शायद इसलिए भी लोकप्रिय हुई कि कई लोग आमोल पालेकर के इस किरदार से अपने आपको जोड़कर देखते... इसी तरह राजपाल यादव अभिनीत 'मैं,मेरी पत्नी और वो' भी बड़ी सराही गई. शायद अपना चरित्र-चित्रण मिला कई लोगों को :-)

इस फ़िल्म की दो बातें कुछ लोगों को बड़ी मजेदार लगी... एक तो अशोक कुमार द्बारा निभाये गए किरदार का नाम 'जुलियस नागेन्द्रनाथ विल्फ्रेड सिंह' और दूसरी 'चिकन आलाफूस'। अब ये बातें कुछ ऐसे लोगों को पसंद आ गई जिन्हें अगर कुछ पसंद आ जाए तो बाकी लोगों को पसंद करवा देना उनका काम होता। और दोनों नाम भी रोचक तो थे ही तो धीरे-धीरे प्रसिद्धि पा गए। और लगभग हर बार रेस्टोरेंट मे पूछा जाने लगा। (मैं शुद्ध शाकाहारी ! लेकिन ये रेसिपी इस कदर नहीं मिली कि मैंने कहा चलो अगर ये रेसिपी मिल गई तो मैं ट्राई कर लूँगा... अब अगर कहीं मिल जाती तो क्या होता... !)। कई बार तो हमारे कलाकार मित्रों ने बाकायदा रेस्टोरेंट वालों को ये भी समझा दिया कि अमेरिकन और फ्रेंच फ्यूजन है ! कैसे बनता है ये भी बता देते :-)

खैर धीरे-धीरे ये कम हुआ और फिर ख़त्म... पर क्या ऐसा नहीं है कि ऐसे ही कई काल्पनिक नाम और मनगढ़ंत घटनाएं इतनी लोकप्रिय हो जाती है कि हम उसे वास्तविक मानने लगते हैं? निर्भर इस पर करता है कि बनाने वाला कितना रचनात्मक है... कितनी धाँसू कल्पना कर सकता है। शायद इसे ही कवि-सत्य कहते हैं... या फिर फ़िल्म-सत्य? क्योंकि कवि-सत्य तो कवि की कल्पना होती है तो इसे फ़िल्म-सत्य कहना ही ज्यादा उचित होगा.

काल्पनिक के अलावा कुछ वास्तविक चीजों की भी लोकप्रियता फिल्मों से बहुत बढती है। कवियों ने बहुत सारे कवि-सत्य तथ्य पैदा तो कर दिए पर चीजों को लोकप्रिय बनाने में फिल्मों के सामने कहीं नहीं टिक पाये. स्विस में गायों की कुछ बड़ी घंटीयाँ भारतीय पर्यटक जितने में खरीदते हैं उतने में भारत में गाय आ जायेगी ! और 'दिलवाले दुल्हनियां ले जायेंगे ' का इस घंटी-विक्री में बहुत बड़ा योगदान दिखता है... फिर फिल्मों में दिखाई गई जगह ढूंढ़ कर वहां फोटो खिचवाना तो आम बात है.

और कुछ हो ना हो आतंरिक पर्यटन बढ़ाने में फ़िल्म उद्योग बड़ा अच्छा काम कर सकता है, अपने देश में अच्छे जगहों की कोई कमी तो है नहीं। पर बाहर शूटिंग करने का मजा भी तो कुछ और होगा, ये तो फ़िल्म-बनाने वाले ही जानें.

--

फिलहाल ये आलाफूस युनुसजी की 'छोटी सी बात' वाली श्रृंखला की इस टिपण्णी से आई। आभार.

~Abhishek Ojha~

28 टिप्पणियाँ:

नारदमुनि उवाच

narayan narayan

अशोक पाण्डेय उवाच

सही बात है। फिल्‍मों का समाज में बहुत असर पड़ता है। फिल्‍मी दुनिया का आकर्षण आदमी को अक्‍सर उनसे जुड़ी चीजों या बातों का अनुकरण करने को प्रेरित करता है।

Neeraj Rohilla उवाच

बहुत सही, हम भी मांग के देखेंगे चिकन आलाफ़ूस...

वैसे हिन्दी फ़िल्मों में हीरा चाटकर मरने वाले सीन को भी बचपन में हम सच मान बैठे थे ।

आपने हासिल फ़िल्म देखी है? हमारे हास्टल में रणविजय सिंह (इरफ़ान खान) वाले किरदार के लोग बडे फ़ैन थे और हम खुद भी ।

Arvind Mishra उवाच

अरे भाई मुझे भी सुबह सुबह नोस्टालजिक कर दिया आपने -विद्या सिन्हा का अलसाया सौन्दर्य भी सहसा जीवंत हो उठा -आईये कभी बनाते हैं चिकन अलाफूस भी -तब यह वास्तविक सत्य हो जायेगा ! कमबख्त नोस्टाल्जिया तो ख़त्म होगा !

ताऊ रामपुरिया उवाच

बहुत बढिया लिखा आपने ! चिकन आलाफूस का जिक्र तो और भी ताजगी दे गया ! :)
वैसे आपने सही कहा की फिल्म बड़ा लीड करती है समाज को ! ताजा उदाहरण की शोले का भूत अभी तक जिंदा है और हमारे ब्लागीवुड के मशहूर निर्देशक कुश साहब नामी सितारों के साथ फ़िर से शोले बना रहे हैं ! लगता है ब्लागीवुड में एक नया ट्रेंड सेट होने जा रहा है ! :) शुभकामनाएं !

अभिषेक ओझा उवाच

@Neeraj Rohilla
नीरजजी 'हासिल' हमारे यहाँ भी बहुत लोकप्रिय हुई. हमने भी कई बार देखी... लेकिन यहाँ चर्चित फिल्मों से हट कर थी तो इसलिए उसका नाम नहीं लिया.

Anil Pusadkar उवाच

हाँ हमको भी याद आ गई वो छोटी सी बात.

कंचन सिंह चौहान उवाच

हे हे हे ऐसी ही एक डिश आज कल मेरे घर में बड़ी फेमस हो गई है.... परात मशरूम कढ़ाही पनीर के कंपटीशन में :) :)

भूतनाथ उवाच

हां..हां.. चिकन अलाफूस ! बहुत बढिया डिश लगती है ! मुंह में पानी आ रहा है ! हमारेंग्पुर में बनती है दाल मटकी तडके वाली ! बहुत लाजवाब !

Shiv Kumar Mishra उवाच

बहुत बढ़िया पोस्ट.

ढेर सारा कुछ याद आ गया. चिकेन आलाफूस सुनकर असरानी का चेहरा....अशोक कुमार जी...विद्या सिन्हा. मेरी बहुत ही फेवरिट फ़िल्म है.

neelima sukhija arora उवाच

परसों रात ही देख रही थी, छोटी सी बात, उस समय़ एक बार तो मेरे दिमाग में भी आया था कि ये चिकन आलाफ़ूस होता क्या है, आपने जानकारी दे ही दी

रंजना [रंजू भाटिया] उवाच

:) बढ़िया ....छोटी सी बात पूरी घूम गई आँखों में ..:)

Gyan Dutt Pandey उवाच

चिकन आलाफूस
नाम पढ़ते ही लगा कि हमारे लिये आउट-आफ कोर्स चीज है। पर जोर लगाकर पोस्ट पढ़ ही गये! :)

Suresh Chiplunkar उवाच

नीरज रोहिल्ला जी से सहमत, हम भी बचपन में जेम्स बाण्ड को असली ब्रिटिश जासूस ही समझते थे… और अब मेरा बेटा हैरी पॉटर को असली जादूगर समझता है :) :)

राज भाटिय़ा उवाच

ओझा भाई तुम रहते कहां हो ?स्विस मै या भारत मै, अगर स्विस मै हो तो किस जगह ? जरुर बताना शायद हम दिसम्बर मै एक दो दिन के लिये जुरिख के पास आये.
भाई हम तो यह चिकन आलाफ़ूस ??? नही भाई हम नही खाते आप का यह चिकन??? लेकिन आप का यह चिकन आलाफ़ूस पढने मै बहुत सुन्दर लगा.
धन्यवाद

Manish Kumar उवाच

यूँ तो हम भी शाकाहारी हैं पर लगता हे मस्ती के लिए ये जुगत हमें भी अपनानी पड़ेगी।

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` उवाच

फिल्मेँ,
फैशन से लेकर
कई झूठी और सच्ची बातोँ को
हमारे मन मेँ
सदा के लिये स्थापित कर देतीँ हैँ -
ये किस्सा मज़ेदार रहा अभिषेक भाई
- लावण्या

Anonymous उवाच

लवली शाट

Anonymous उवाच

लवली शाट

मा पलायनम ! उवाच

अच्छा लिख रहें हैं .बधाई .फिल्में तो समाज का आइना होती ही हैं

Zakir Ali 'Rajneesh' उवाच

चिकन आलाफूस, भई नाम तो बडा मजेदार है। लेकिन हमारी बदनसीबी की एक तो हमने इसका नाम तक नहीं सुना, दूसरे वेजीटेरियन जो ठहरे, अगर पता चल भी जाए कि कहां यह मिलती है, तो भी क्या फायदा?

pallavi trivedi उवाच

ha ha..kya mast movie thi. saare charecter jaandar.. aur chicken alafus kya tha..ye to ham bhi nahi samajh paaye the.

singhsdm उवाच

चिकन अलाफूस का ज़िक्र कर आपने फ़िर से छोटी सी बात की याद दिला दी.........वैसे मैं भी शाकाहारी हूँ मगर चिकन अलाफूस मिल जाए तो खाऊंगा मैं भी......

कार्तिकेय उवाच

बड़ी लज़ीज़ अलाफूसात्मक पोस्ट रही.

वैसे अगर कभी रेसिपी मिले तो ज़रूर बताइयेगा. यह डिश तो किसी वैष्णव भोजनालय में ही मिलेगी.

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन उवाच

हमें तो चिकन अलाफूस याद नहीं पड़ता है भई! इसकी एक ही वजह हो सकती है और वह यह कि यह फ़िल्म फ्लॉप नहीं हुई होगी. हम ठहरे सिर्फ़ फ्लॉप फिल्में देखने वाले - जो फ़िल्म पहले शो में देखी वो समझो उसी दिन उतर गयी.

योगेन्द्र मौदगिल उवाच

बढ़िया प्रस्तुति के लिये बधाई

डॉ .अनुराग उवाच

फ़िल्म तो देखी थी पर इतने गौर से नही पर हाँ दिलवाले में गाय की घंटिया याद है......क्या कहूँ आपकी नजर का भी जवाब नही

BrijmohanShrivastava उवाच

दुर्भाग्य कि शाकाहारी हूँ /और बड़ा दुर्भाग्य फ़िल्म देखता नहीं हूँ /अब आपको भी हाइकू के नियम पता चल ही गए है तो बढ़िया है खूब जमेगी /जब थोड़े में काम चले तो घणी म्हणत कुण करे