अपने अद्भुत स्वपन की बात बताने के पहले मैं आपको अपनी ये पढ़ी हुई बात बता देता हूँ... शायद ये कभी का पढ़ा हुआ ही ऐसे स्वप्न का कारण बन गया. गीताप्रेस की एक पुस्तक में कभी पढ़ा था, चार महापाप होते हैं : स्वर्ण की चोरी, गुरु-पत्नी के साथ व्याभिचार, ब्राह्मण की हत्या और मदिरापान. ठीक-ठीक तो याद नहीं पर शायद मनुस्मृति से लिया गया था. मैंने थोडी बहुत धार्मिक पुस्तकें भी पढ़ी है (धार्मिक मतलब हिंदुत्व के अलावा भी). हिंदुत्व की कुछ पुस्तकों में ये साफ़ दीखता है की मेरे पूर्वजों ने अपने फायदे की कई बातें लिखी हैं. (मैं आपको बता दूँ की मैं ब्राह्मण हूँ!) खैर ये बातें फिर कभी. मैं भी कहाँ फँस गया इस चक्कर में, यहाँ तो बात हो रही थी एक दिव्य स्वप्न की.
शनिवार की सुबह मुझे एक स्वप्न दिखाई दिया... स्वप्न में विश्वकर्मा भगवान् के दर्शन हुए... हाथ में मोबाइल लैपटॉप लिए हुए, सोच रहा था की हथौडा जैसा कुछ होना चाहिए पर उनका तेज और परिचय देखकर चुप रह जाना ही बेहतर समझा. बस एक झलक देखि तो लैपटॉप पर एक से एक 3D मॉडल... इससे ये तो पता लग गया कि वहाँ भी बहुत विकास हुआ है. और कमाल की बात ये की वो मुझ पर प्रसन्न थे. पहले आश्चर्य हुआ फिर सोचा की अरे महापाप तो किया नहीं अब तक और पाप शब्द तो इतना व्यापक है कि कुछ कहा ही नहीं जा सकता तो शायद बेनेफिट ऑफ़ डाउट दिया गया हो!
गणित कि भाषा में कहूं तो ये होगा कि पाप पूर्णतया परिभाषित ही नहीं है इसलिए 'तुम्हारे द्बारा किए गए पाप' एक परिभाषित समूह/समुच्चय(set) नहीं है. खैर जैसे भी हो, कारण का क्या करना था मुझे... मुझे लगा कि लकी ड्रा में मेरा नंबर आ गया होगा आज. वैसे भी आज तक कितनी लाटरियाँ जीत चुका हूँ क्या बताऊँ... रोज़ अफ्रीका के कोई अमीर मुझे अपना वारिस बनाने पे तुले रहते हैं, वो तो मैं हूँ कि ईमेल पढ़ते ही मुस्कुरा कर मना कर जाता हूँ.
भगवान् ने कहा 'वर मांगो !'
मैंने कहा: 'भगवान् माँगने को तो बहुत कुछ है, लाखों चीज़ें दिमाग में घूम रही हैं पर लग रहा है कहीं आप भी न कह दें...वर दे दिया अब इसके लिए एसेमेस भेजो और हर एसेमेस का १० रुपया. कुछ तो तिकड़म होगा मुझे अपनी किस्मत पर बहुत भरोसा है. साथ में येभी डर लग रहा है कि शनिवार सुबह-सुबह कि नींद ख़राब न हो जाय. कहीं ये मजाक कि तरह कि बात हो तो मेरी नींद तो गई... अभी २ घंटे पहले ही तो सोया हूँ.'
भगवान् मुस्कुराए बोले: 'तुम्हे नींद इतनी प्रिय है?'
'भगवन प्रिय तो बहुत कुछ है पर प्रिय चीज़ें मिलती कहाँ हैं... आपके जैसा तो आराम है नहीं कि हाथ घुमाओ और पूरा हो गया. मुझे तो लगा था कि आप लोग पृथ्वी भूल ही गए होंगे किसी और ग्रह को टारगेट करके आराम की जिंदगी जी रहे होंगे! अब आप आ भी गए हैं तो आपको क्या पता... आपको तो लग रहा होगा कि अभी भी लंगोटी पहने हम घूम रहे होंगे... अभी-अभी ४ फिल्में निपटा के सोया हूँ. अभी यही कोई ५-५.३० बज रहे होंगे, बड़ी मुश्किल से तो वीकएंड पे समय मिलता है. अभी आप जगा दो तो वो भी ख़राब. और ये यंत्र जो मेरे बगल में पड़ा है और हाँ ये आपके हाथ में भी तो है... आपका ही आशीर्वाद होगा मानव को... ये मेरे जीव का जंजाल बना हुआ है.' मैंने बगल में पड़े हुए मोबाइल कि तरफ़ इशारा करते हुए कहा.
'अरे इसने क्या कर दिया, ये तो बड़े काम कि चीज़ है'
'सुना तो था कि आप लोग अन्तर्यामी होते हो ! देखिये भगवन ये जितने साले-ससुरे कभी फ़ोन नहीं करते वो शनिवार-रविवार कि सुबह ही क्यों घंटा बजाते हैं? अगर सायलेंट करके सो जाओ तो अलग बवाल, बंद कर दो लोग जीने ही नहीं देंगे सब कुछ उसी दौरान अर्जेंट हो जायेगा. माफ़ कीजियेगा अगर कुछ ग़लत शब्द बोला हो तो लेकिन आजकल गुस्सा ऐसे ही दिखाया जाता है... मैंने तो कम ही शब्द इस्तेमाल किए हैं. अब आप ही बताइए इन्द्र दरबार में उर्वशी का नृत्य चल रहा हो और मैं आपके इस यन्त्र की घंटी बजा दूँ तो... अब आपकी जैसी किस्मत कहाँ कि नृत्य देखूंगा लेकिन अब तुलना तो रिलेटिव करनी ही पड़ेगी. कहाँ आप और कहाँ मैं !'
उर्वशी का नाम सुनकर भगवान् भी सीरियस हो गए... सीरियस कैसे नहीं होते मुद्दा ही ऐसा छेड़ दिया था. अपने सर पर पड़े तो सबको समझ आता है. बोले 'अरे ये तो महापाप सा प्रतीत होता है... मैंने मानव कि भलाई के लिए ये यंत्र दिया... पर तुम रात्रिचर हो गए तो मेरी क्या गलती है?' एकाएक उनके दिमाग ये आईडीया आया.
मैं भी कब हारने वाला था बोला: 'देखिये भगवन बात अब पहले जैसी नहीं रही... मामला बहुत दूर तक बढ़ गया है, अगर मैं कब, क्यों और कैसे रात्रिचर हुआ बताने लगूं तो आपका बहुत समय ख़राब हो जायेगा. वैसे भी मैं अकेला विनर तो हूँ नहीं और भी होंगे. मुझे अपना लक पता है... लाखो और होंगे जिन्हें आपको निपटाना होगा.'
इस बात में भी सच्चाई निकल गई.
भगवान् बोले: 'चलो मैं तुम्हारी समस्या सुलझाए देता हूँ... शनिवार-रविवार को सुबह ११ बजे के पहले तुम जैसे २ दिवसी रात्रिचर लोगों को फोन करना महापाप माना जायेगा.'
'पर भगवान् ये बात लोगो तक कैसे पहुचेगी?, मैं धार्मिक पुस्तकों में सुधार तो नहीं कर सकता और कर भी दिया तो मानेगा कौन? उल्टे लोग धार्मिक/रेसिस्ट बोल के आन्दोलन चला देंगे तो बस राजनीती में ही कैरियर बनाना पड़ेगा.'
'देखो पुत्र, अब ये लोगों को बताना तुम्हारा काम है, तुम्हारे पूर्वज तो इस काम को बड़े मजे में कर डालते थे... चित्रगुप्त के डाटाबेस में महापाप अपडेट कराने कि जिम्मेदारी मेरी, बाकी तुम संभालो. और हाँ अगर कोई अनजाने में कर दे तो वो पाप नहीं होगा ये भी याद रखना. वो पाप क्षमा के योग्य हो जायेगा क्योंकि ये स्पेसल महापाप है. अब इससे ज्यादा बोल दूँ तो पास नहीं करा पाउँगा. ऊपर जाके अभी अमेंडमेंट लाने में जो दिक्कत होगी वो मैं ही जानता हूँ, गुटबाजी वहां भी पहुच गई है. अभी दस तरह के सवाल होंगे की क्यों दे आए वरदान ' मैं बोलने वाला था कि देखिये भगवन पूर्वजों के किए का इतना कुछ सुनना-सहना और भोगना पड़ता है और अब आप भी चालु हो गए. पर भगवान् अर्जेंसी दिखाकर निकल लिए.
जैसे रोज अमीर बनाने के ईमेल और लकी होने के एसेमेस आते हैं वैसे ही भगवान् भी ठगा हुआ सा छोड़कर चलते बने. कहाँ झांसा दिखाया था कि वरदान मिलेगा और कहाँ इस हाल में छोड़ गए. रोकता भी कैसे... जाते-जाते बोल गए की राजभवन से फ़ोन आ रहा है अप्सरा-नृत्य प्रारम्भ होने वाला है.
खैर मैंने सोचा की आप को तो कम से कम बता दूँ. आप इस महापाप से बचियेगा क्योंकि सुना है कि चित्रगुप्त का सिस्टम बड़ा मस्त है और उसमें कोई बग भी नहीं है.
~Abhishek Ojha~
Jun 26, 2008
एक नया महापाप !
Jun 17, 2008
क्यों तुम ही यादों में बसी वो नहीं !
वो:
जगह: लोनावाला
शनिवार का दिन, मूसलाधार बारिश... जिधर देखो जल ही जल... जिधर नज़र उठा लो एक जलप्रपात ... पहाडों पर हरियाली भी अच्छी खासी लौट आई है,
शायद मानसून सीज़न का पहला सप्ताहांत है अच्छी खासी भीड़... मुम्बई-पुणे से खूब लोग आए हैं...,
अधिकतर कॉलेज में पढने वाले और सोफ्टवेयर में काम करने वाले हैं... हमारी मित्र मंडली भीड़ की रेटिंग करे तो ७/१०,
और फिर वो दिख गई... भीगी हुई... कुछ तो ख़ास है उसमें तभी तो भीड़ में अलग दिख रही है... खिलखिलाती हुई, खासकर लड़को को देखकर पता नहीं क्या फुसफुसा देती है... हर दो मिनट पर जुल्फों को ठीक करती हुई और अपने कपडों को नीचे खीचती हुई...
मित्र मंडली से एक की आवाज़ आई... 'जब इतना नीचे करना पड़ता है तो इतना छोटा लेती ही क्यों है !'
सवाल जायज था... फ़िर भी मैंने कहा: 'अरे यार ये कपड़े यूरोपियन माप दंड के होते हैं...'
'तुझे तो बहुत पता है... '
'अरे नहीं यार मुझे क्या पता है कल एक इंटरव्यू ले रहा था उसमे पता लगा[१]... IIT दिल्ली में एक प्रोजेक्ट चल रहा है... जिसमें भारतीय कपडों के लिए सही मापदंड निर्धारित करने का काम चल रहा है... अभी भी हमारे देश में रेडिमेड कपडों का मानदंड यूरोपियन ही होता है... और यूरोपियन मापदंड से कपड़े बनाने पर बहुत ज्यादा मात्रा में कपडों की बर्बादी होती है ... तुमने अक्सर देखा होगा अपनी जींस बड़ी निकल जाती है... ये बात अलग है की यहाँ मामला उल्टा है... in fact all this can be a very good optimization project...[२] वैसे छोड़ ये सब... लेकिन साले इसमें बुराई क्या है तेरी मानसिकता ही ख़राब है'
'हद है यार मेरी मानसिकता को क्या हो गया? मैं ये थोड़े ना कह रहा हूँ की ड्रेस ख़राब है ये तो कुछ ज्यादा ही अच्छा है... पर मैं ये कह रहा हूँ की या तो ऐसा पहनो और निश्चिंत हो जाओ, जैसा की यूरोप में करती हैं... या फिर एक इंच बड़ा ही पहन लेने में क्या बुराई है... ' ये भी सही. खैर मैं ये कहाँ अपनी बातचीत सुनने लगा...(वैसे शीर्षक से ही आप समझ गए होंगे कि मुझे उसके बारे में ज्यादा याद नहीं, कम से कम उसका चेहरा तो याद नहीं) मोहतरमा सबको अच्छी लग रही थी... भीड़ में अलग तो मैं कह ही चुका हूँ ... अगर मित्र मंडली एक शब्द बोलती है ऐसों के लिए तो वो होता है: 'टू होट' !
और अगले दिन तुम दिख गई !
तुम:
जगह: आइनोक्स मल्टीप्लेक्स, पुणे
शो स्टार्ट होने वाला है अभी करीब आधे घंटे बाकी है, पुणे है तो कॉलेज के लड़कियों का कमी नहीं, अक्सर हमारी मित्र मंडली के लोग फिल्में देखने इस कारण से भी जाते हैं, अगर भीड़ की रेटिंग करें तो ८+ होगी... बिना किसी विवाद के !
पहना तो तुमने भी जींस ही है पर बाकी जो कुछ पहना है उसमें कुछ एडजस्ट करने की जरुरत नहीं और उससे क्या तुलना करूं तुम्हारी उसने तो बस कुछ पहनने के लिए पहन रखा था. तुम इधर-उधर देखने में इतना डरी हुई क्यों लग रही हो... ये अदा तो शायद पहले किसी में देखी ही नहीं... लग रहा है जैसे एक हिरनी हिंसक जानवरों के बीच में खड़ी हो... कुछ उछल-कुद नहीं... तुम्हारा भीड़ में अलग दिखने का कारण तुम्हारा कपड़ा नहीं, कोई कृत्रिम अदा नहीं, (तुम्हे कृत्रिमता की जरुरत ही क्या है!) वरन तुम्हारी मासूमियत है... तुम्हारी खूबसूरती ! तुम्हारा चेहरा, झुकती हुई निश्चल बड़ी-बड़ी आंखें क्यों नहीं भूल पाता. क्यों उस १५ मिनट के दौरान की तुम्हारी एक-एक बात याद है.... तुम्हारे कानों में लटके हुए वो पता नहीं... उसे झुमका कहते हैं या कुछ और... रिंग तो नहीं हैं... फिर झुमका ही कहेंगे! अगर मैं चित्रकार होता तो शायद तुम्हारा एक जीवंत चित्र बना सकता. मैं कवि नहीं... अच्छा लेख तक तो लिख नहीं सकता... तुम्हारी खूबसूरती का बयान क्या करूँगा... पर जिसे तुम्हारी खूबसूरती जाननी हो ... तुम्हारा जिक्र करके मेरे चेहरे पे आने वाले भाव को देख ले ! जिसे 'होट' कहते हैं उससे कई गुना 'होट' होते हुए भी क्यों तुम्हे मेरी मित्र मंडली 'होट' कभी नहीं कह सकती... चाहे कोई भी हो तुम्हारे लिए तो एक ही शब्द प्रयोग करने लायक है... खूबसूरत !
फिलहाल मेरी नज़रें तो इतनी तेज नहीं या फिर तुम्हारे अलावा मैं कुछ देख ही नहीं रहा... मेरे मित्र ने बता दिया 'बाप के साथ आई है ! उसे देखो जो बगल में हैं।'
पता नहीं भगवान् ने मुझे ऐसी नज़रें क्यों नहीं दी, मेरे मित्र तो ऐसे-ऐसे है की देखते ही बता दें की 'एंगेजड है या नहीं', 'इसका ब्वायफ्रेंड होगा या नहीं', 'साथ में जो है वो भाई है या ब्वायफ्रेंड', 'माँ, बाप... पूरी कुंडली निकाल के रख देते हैं'... और मुझे तो 'शादी-शुदा है या नहीं' ये भी पहचानने में दिक्कत हो जाती है।
खैर तुम्हारी मासूमियत का कारण बहुत हद तक ये भी हो सकता है की तुम बाप के साथ थी.... पर पता नहीं मन ये कारण मानने को तैयार नहीं है ! जो भी हो अगर इतनी अच्छी लग रही हो तो ऐसे ही क्यों नहीं रह सकते...
शायद तुम्हारा जवाब होगा: 'तुम्हे अच्छा लग जाने से क्या होता है'!,
वैसे भी सबको तो यही लगता है कि मैं दुनिया में २५-३० साल देर से आया हूँ, बनाया तो गया था पहले ही आने के लिए... मेरे मित्र भी तो यही कहते हैं कि मेरे विचार पिछली पीढ़ी वाले हैं। जो भी हो मैं तो तुम्हे तुम्हारे ही रूप में याद रखना चाहता हूँ कभी उसके रूप में मत दिख जाना... जो अमिट छाप दिमाग पर पड़ी है उसे मत मिटा देना !
[१] एक इंटरव्यू में उम्मीदवार से उसके प्रोजेक्ट पर पूछ लिया था, उसी से इस प्रोजेक्ट के बारे में पता चला...
[२]जिस के दिमाग में लड़की के कपड़े देख कर optimization आता हो... इस 'ये तो हद ही हो गई' वाली बात का ख्याल अभी-अभी आया है (क्या आप इससे अधिक नीरस आदमी से मिल सकते हैं? शायद इस जन्म नहीं) लानत है मुझ जैसे आदमी पर !
* लोनावाला में अभी बहुत अच्छा मौसम है... तस्वीरें अभी एक मित्र के कैमरे में है... मिलते ही पोस्ट करता हूँ... भारी बारिश होने के कारण कई अच्छी जगहों के चित्र नहीं ले पाया :(
डिस्क्लैमेर: ये पोस्ट ऐसे ही बिना सोचे-समझे लिखी गई है पर सच्ची घटना है, कुछ सोचा नहीं बस टाइप करता गया.... किसी को कोई आपत्ति हो तो क्षमा चाहता हूँ वैसे भी आप समझ ही गए होंगे की इन चीजों की मुझे कितनी समझ है :-)
~Abhishek Ojha~
Jun 10, 2008
एक बार किताब उठा के देखो तो पता चले नींद क्या चीज़ है !
कल मेरे एक मित्र ने कहा की आजकल नींद नहीं आती. मुझे लगा की ये तो सही में समस्या है... और भारतीय होने के नाते अब मेरा कर्तव्य बनता है की मैं कुछ सलाह दूँ. मेरे कर्तव्य की मदद के लिए मुझे अपने स्कूल की एक घटना याद आ गई.कभी-कभी ऐसी यादें बिल्कुल सही समय पर आकर अपना काम कर जाती हैं.
एक बार मेरी हिन्दी की एक शिक्षिका ने पूछा: 'कुछ ऐसा काम बताओ जिसे करने में तुम्हे बहुत अच्छा लगता हो. बात कुछ हटके होनी चाहिए... घिसा-पिटा उत्तर सुन-सुन के मैं थक गई हूँ.' पूरी क्लास घूमते-घूमते मेरा नंबर तो आना ही था... मैंने भी सोचा की इमानदारी से उत्तर दूंगा... और उत्तर हटके तो होना ही चाहिए...
मैंने कहा: 'मैडम... मुझे पढ़ते हुए सोना बहुत अच्छा लगता है... !'
'पढ़ते हुए सोना?' पूरी क्लास हंसने लगी !
मैं कब हारने वाला था... मैंने भी वर्णन करना शुरू किया... 'मैडम देखिये जब तक पढ़ रहे हो... पढ़ाई में मन लग रहा हो तो ठीक नहीं तो बोर होइए. और नींद आने के बाद तो सो जाओ... क्या फर्क पड़ता है. पर ये जो बीच का समय होता है... झपकी लेने वाला... न आप पढ़ रहे हो ना सो रहे हो. वो परमानन्द का समय होता है.'
थोडी चर्चा के बाद अंततः मैडम ने भी माना की परमानन्द तो थोड़ा ज्यादा हो गया पर बच्चे की बात में दम है. पर साथ में मैडम ये भी कह गई... 'बेटा संसार में पढने और सोने के अलावा भी चीज़ें हैं.. कभी इनसे बाहर निकल के देखो दुनिया कितनी रंगीन है!'
मैडम की बात भी ग़लत नहीं थी... जिसको पढ़ाई से जुड़ी किसी भी चीज़ में आनंद आने लगे वो तो वैसे ही नीरस हो गया जैसे आमोल पालेकर गोलमाल में कहते हैं ... 'जिसका नाम भवानी शंकर हो तो वो आदमी तो पैदा होते ही बुड्ढा हो गया' :-). खैर अब मैं मैडम को क्या बताऊं की दुनिया मुझे कितनी रंगीन दिखती है... लेकिन वो रंगीनी जिसकी तरफ़ मैडम का इशारा था वो भी सपने तक ही सीमित रही और सपनों का सम्बन्ध फिर सोने से. खैर मैं ये कहाँ फँस गया सोने-पढने-सपने के झमेले में... असली मज़ा तो इनके संगम में है. हाथ में किताब... नरम बिस्तर और झपकी का जो मज़ा है.. उसकी बात ही कुछ और है.
फिलहाल मेरे मित्र को नींद नहीं आने के बारे में मैंने कुछ यूं जवाब दिया...
उन्होंने कहा: 'कमबख्त नींद है कि आजकल आती ही नहीं है'
मैंने कहा: 'पढ़ते हो नहीं और कहते हो कि नींद नहीं आती है... एक बार किताब उठा के तो देखो फिर पता चले नींद क्या चीज़ है'
उन्हें पहली बार में कुछ समझ नहीं आया... समझाना पड़ा, इसलिए मैंने इतना बखेड़ा लिखा इस लाइन लिखने के पहले, ताकि आपको समझने में दिक्कत ना हो !
वैसे आपने कभी परमानन्द का अनुभव किया है या नहीं?
~Abhishek Ojha~
Jun 5, 2008
इनवेस्टमेंट बैंकिंग... 'F' शब्द... खोया-खोया चाँद और एक खूबसूरत सुबह !
इनवेस्टमेंट बैंकिंग बदनाम है बहुत ज्यादा वर्क लोड के लिए... इनवेस्टमेंट बैंकिंग से जुड़ी किताबों ने और बदनाम कर रखा है. नौकरी चालू करने के बाद ये बात बहुत ज्यादा महसूस नहीं हुई... शायद पहले से ही धारणा बनी हुई थी या फिर पहले से ही ऐसा जीवन जीने की आदत हो गई थी. फिलहाल पिछले शुक्रवार की रात २:१५ (या फिर शनिवार सुबह कह लें) पर मोबाइल बजा तो नंबर दिखा: ००*** . तुरत माथा ठनका कि अरे ऐसे नंबर से तो ऑफिस वाले फ़ोन पर कॉल आता है.... कोई न्यूयार्क से अपने ब्लैकबेरी से कॉल कर रहा था... इस समय पर? वैसे उस समय भी मैं जाग रहा था और 'Development with dignity: A case for full employment' पुस्तक पढ़ रहा था. खैर फोन उठाया तो शक सही निकला... उधर मेरी एक अनालिसिस खोली गई थी जिसमें था $४ करोड़ का घाटा. घाटे का कारण किसी को मिला नहीं तो मुझे याद करने का शुभ काम किया गया. मैंने घर से काम करने का एक्सेस नहीं लिया है. ऑफिस का काम वहां से निकलते ही भूल जाने में विश्वास रखता हूँ. घर पर बस थोड़ा-बहुत पढ़ लेता हूँ, जिसका इस्तेमाल अगले दिन होना होता है. पर काम .... ना !
खैर अब मैं देख तो सकता नहीं था की समस्या क्या है. तो थोडी देर में ये फैसला लिया गया कि १ घंटे में मैं ऑफिस चला जाऊँ. जिनका फोन था वो हमारे बड़े वाले बॉस है... बड़े साहब MIT से PhD हैं, अब वो १६-१८ घंटे तक काम कर जाते हैं... ऐसे लोगों को मना भी नहीं कर सकते. जो ख़ुद इतनी लग्न से काम करता हो और इंसान भी अच्छा हो... इतना तो साफ है की मामला बहुत गंभीर था. थोडी खुशी भी हो रही थी की चलो हमारी भी इम्पोर्टेंस है (वैसे इसको कहते हैं पोजिटिव थिंकिंग... रात को २:३० बजे ऑफिस जाना पड़े और सोचो की हमारी इम्पोर्टेंस है)
रास्ते में एक बार ऊपर की तरफ़ देखा तो साफ आसमान, चाँद और हजारों तारे... मुझे याद आया... कि आसमान ऐसा भी होता है (ऑफिस, ऊपर देखो तो स्ट्रीट लाईट और फिर रात को फ्लैट में बंद... व्यस्त जीवन हो जाए तो कितनी जल्दी खूबसूरत चीजें भी दिमाग से निकल जाती हैं). पूरे रास्ते... खोया-खोया चाँद, खुला आसमान... गुनगुनाते रहा. जींस, टी-शर्ट और सैंडल पहने ऑफिस पहुच गया था. उस समय हमारे ऑफिस में तो कोई नहीं था पर हमारा ऑफिस विप्रो कॉम्प्लेक्स में है तो कॉल सेंटर के कई लोग इधर-उधर भटक रहे थे. हमारे फ्लोर पर जो एकाध लोग थे उनका घुरना देख कर मैं सोच में पड़ गया कि कहीं तो कुछ गड़बड़ है! मैंने मन में सोचा.... 'Its fu**ing friday night dude! what you want me to wear... a suite?' (कई बातें हैं जो हिन्दी में उतनी सहजता से नहीं कही जा सकती खासकर फूहड़ बातें) और हाँ यहाँ आपको बता दूँ कि इनवेस्टमेंट बैंकिंग में जो अपने को जितना होशियार समझता है वो उतना ही ज्यादा 'F शब्द' इस्तेमाल करता है. इस इंडस्ट्री में आने के बाद ही पता चला कि F शब्द इतना व्यापक है और इतने क्रिएटिव इस्तेमाल होते है इसके.
अचानक मुझे ध्यान आया कि मैंने LEHMAN BROTHERS की टी-शर्ट पहन रखी है (IIT से निकलने के बाद कुछ सालों तक कई सारी कंपनियों के टी-शर्ट की कोई कमी नहीं होती). LEHMAN BROTHERS की टी-शर्ट पहन के CREDIT-SUISSE के ऑफिस में... भारत-पाकिस्तान में से किसी एक देश के आर्मी का ड्रेस पहन के दुसरे की सीमा में चले जाना कहूँगा तो थोड़ा ज्यादा हो जायेगा... पर अगर लिखते समय ऐसी बात दिमाग में आ रही है तो आप समझ सकते हैं की मामला संगीन है, वैसे रात थी तो कोई बात नहीं. खैर $४ करोड़ वाला मामला थोडी देर में निपट गया... आपको यहाँ बताता चलूँ की इनवेस्टमेंट बैंक में होते हुए जब तक आप पैसा बना रहे हैं आप सही है... जिस दिन घाटा हुआ... उसी दिन ये साबित हो जाता है की आप अब तक ग़लत कर रहे थे !
५ बजे सुबह ऑफिस से निकला तो एक साथी का फोन आया की पंचगनी के लिए आधे घंटे में निकलना है... मैंने कहा... मैं अभी ऑफिस से वापस आ रहा हूँ ...थोडी देर लग सकती है... 'what the Fu** were you doing in office on a friday night?' खैर दो बातें तो साफ है बिना 'F' शब्द के बोलना कुछ इनवेस्टमेंट बैंक में काम करने वालों को बेमानी लगता है... और शुक्रवार की रात बहुत मायने रखती है. खैर रात के खोये-खोये चाँद की तरह सुबह भी बहुत खूबसूरत निकली... इससे पहले अच्छी सुबह शायद ये मिली थी. पर क्या करें सुबह उठाना तो ५-६ सालों से भूल गया हूँ... कितनी खूबसूरत चीजें खोता जा रहा हूँ... :(
फिलहाल पंचगनी की ये तस्वीर... बाकी तस्वीरें, यात्रा वृतांत और इनवेस्टमेंट बैंकिंग की बाकी बातें फिर कभी
~Abhishek Ojha~
Jun 3, 2008
IIT में एक और आत्महत्या
शनिवार के दिन मैं पंचगनी में था... फोन में सिग्नल ना के बराबर (कभी-कभी ये बहुत शुकुन की बात होती है) पर घंटी बजी और दिल्ली का नंबर दिखा.
एक मित्र का आवाज़ आई: 'ओझा भाई, कैसे हो?'
'मैं ठीक हूँ, तुम सुनाओ कैसे हो?'
'बस सब ठीक है, IIT में एक और सुसाईड हो गया... !'
'what? कब? which year? कैसे? कारण?'
एक-एक करके लगभग सारी बातें पता चली... final year, होस्टल के कमरे में ही फांसी लगाकर, BSBE department, लड़की थी, IIMS से काल्स भी आई थी,... हैल्थ प्रॉब्लम, BTP में फक्का... ! (B.Tech. Project, फक्का: F-ग्रेड) दीक्षांत समारोह के ठीक पहले! शायद समय पर डिग्री ना मिल पाना! सारे प्रयास फिर से विफल, सारी काउंसिलिंग ... सब बेकार.
'अरे यार ये भी कोई कारण होता है... ' 'चलो मैं तुमसे बाद में बात करता हूँ. '
मैं कुछ भी बोल रहा था... ऐसी सिचुएसन में मैं बिल्कुल नहीं बोल पाता...
अभी डेढ़-दो महीने ही तो हुए... वो फर्स्ट इयर का छात्र था... पहले साल में ऐसी एक घटना हो जाती थी... अब तो एक सेमेस्टर में २-२. अर्जुन सिंह के रिज़र्वेशन के बाद क्या होगा?
फर्स्ट इयर हो या फाइनल... मेरी नज़र में तो आत्महत्या का कोई कारण हो ही नही सकता... चाहे कैसे भी हालात हो जाय. पर मेरे लिए कह देना शायद आसन है...वो ही समझ सकता है जिस पर गुजरी होगी. अलग-अलग सिचुएसन... मौत के भयावह और अलग-अलग तरीके... जिन्हें सोच कर ही डर लगता है.
IIT से मुझे बहुत लगाव है और ऐसी खबरें बहुत दुःख पहुचाती है.. सच बोलूँ तो थोडी देर के लिए तो व्यक्तिगत क्षति लगती ही है. कहते हैं भारत में किसी किशोर के लिए IIT से अच्छा कुछ नहीं हो सकता और इसे शायद वो बेहतर समझता है जो वहाँ रह चुका है... जहाँ अधिकतर लोग इसे अपने जीवन का सबसे सुखद हिस्सा मानते हैं वहीं कुछ लोग इसे अपने जीवन में आए एक बुरे सपने की तरह देखते हैं... जिन्हें लगता है की उनसे उनका सब कुछ छीन लिया गया... किताबों और ग्रेड्स के बीच अपने जीवन को घिरा हुआ पाते हैं। मुझे याद है एक बार एक चर्चा में मैंने कहा था: 'कभी किसी भारतीय इंजिनियर से ये मत पूछना की वो IITian है क्या !, क्योंकि अगर वो होगा तो थोडी देर में ख़ुद ही बता देगा और अगर नहीं तो उसे बुरा लगेगा !' इतने गर्व की बात होना... वो भी उस देश में जहाँ हर जगह इतनी समस्याएं हैं... फिर ऐसा क्यों? आख़िर क्यों? गलती किसकी है?
प्रोफेसर? अक्सर लोग इन्हे ही गालियाँ देते हैं... मेरे बहुत सारे दोस्त भी. पर मैं ऐसा नहीं कर पाता, पता नहीं क्यों मुझे ऐसा लगता है की कभी कोई प्रोफेसर दुश्मनी से किसी को फक्का नहीं दे सकता... प्रोफेसर मजबूरी में ही फेल करेगा (ये मेरा मानना है, वैसे फेल होना भी तो किसी भी तरह से आत्महत्या का कारण नहीं बनता)
क्या छात्र ख़ुद? नही इस उम्र में इतनी बड़ी गलती के लिए जिम्मेदार नहीं कह सकते... नासमझी जरूर कह सकते हैं.
अभिभावक? मुझे लगता है की कहीं-ना-कहीं अभिभावक, अनजाने में ही सही, ऐसी घटनाओं के लिए जिम्मेदार होते हैं... कुछ घटनाओं में तो ऐसा साफ होता है. समस्या ये है कि अभिभावक को भी ऐसी बातों का पता नहीं होता है... जब बेवजह टॉप करने का प्रेशर हो तो क्लास में पीछे रहना तो दूर फेल होने कि बात कोई कैसे बता सकता है? IIT में जाने वाले लगभग हर छात्र अपने स्कूल में टोपर्स रह चुके होते हैं और माता-पिता ये धारणा बना के चलते हैं कि ये तो IIT में जाने का बाद भी चलता ही रहेगा. और यहाँ ऐसा नहीं होने के कई कारण होते हैं सबसे बड़ा कारण है: वैसे ही छात्रों के बीच relative grading ! अभिभावकों द्वारा रिश्तेदारों और अन्य लोगों के सामने अंधाधुंध बड़ाई भी एक कारण है, जो अनायास ही प्रेशर का कारण बन जाता है. कई बार जानकारी ना होते हुए भी माता-पिता बेवजह पढ़ाई में हस्तक्षेप करते हैं.
ऐसा क्यों है कि माता-पिता से बच्चे अपनी समस्याएं बताने में डरते हैं? ख़राब ग्रेड आने पर वो घर वालों को क्यों नहीं बता पाते? फेल होने के बाद summers में रुक कर आसानी से कोर्स निपटाने की व्यवस्था है, पर असली समस्या तो घर वालों को बताने में ही आती है. बच्चों को कोउन्सेलिंग की जरुर तो है पर साथ में ऐसे अभिभावकों को उनसे कहीं ज्यादा काउंसलिंग की जरुरत होती है. यहाँ अभिभावक के साथ समाज का एक हिस्सा भी होता है जो ऐसी बातें पता लगाने में लगा रहता है. और हर वक्त दूसरो की समस्याएं उछलने और उन पर हँसने में लगा रहता है.
वैसे कई बार व्यक्तिगत कारण भी होते हैं, कई तरह की समस्याएं... भागवान जानें...
मेरी बस यही कामना है की ऐसे घटनाएं दुबारा फिर ना हो... पर अब ये आम बात होती जा रही है... इसी बात का दुःख है.
भगवान तोया की आत्मा को शान्ति प्रदान करें और उसके घर वालो को इस संकट की घड़ी में साहस.
~Abhishek Ojha~
तस्वीर साभार : http://www.healthnews-stat.com/?id=857=teen-suicide-CTC
[ IIT पर लिखे पिछले पोस्ट को ठीक एक साल हो गए... कैम्पस से ही लिखा था... कभी सोचा नहीं था की अगली पोस्ट ऐसी लिखनी पड़ेगी :-( ]




