निवेश बैंकिंग और अंको का मस्त नाता है, आप चाहें न चाहें अंको से पाला पड़ता ही रहता है. तो हुआ यूँ के मैं एक स्प्रेडशीट खोले बैठा अंको को देख रहा था और कुछ ऐसा बोला:
'पन्द्रह छक्का नब्बे, सात पिचोत्तर... उम्म्म... कुछ एक मिलियन होना चाहिए'
अब क्या करें?... अपनी आदत है बीच-बीच में बोल देना... जो करता हूँ, कभी-कभी बीच में बोल भी देता हूँ. मुझे क्या पता था की लोग इतनी फुर्सत में होते हैं और एक-एक शब्द सुनते रहते हैं... मेरे बगल में जो सज्जन थे उन्हें बड़ा मजा आया ... उन्होंने पूछा:
'व्हाट यू जस्ट सेड?'
'नथिंग, आई वाज़ जस्ट लूकिंग ऐट दिस पोर्टफोलियो एंड सम नंबर्स असोसिएटेड विथ दिस !'
लेकिन इतनी आसानी से मान जाते तो पूछते ही क्यों? इतना तो वो भी समझ ही गए थे कि मैं क्या बोला था... लेकिन वो मेरे मुंह से सुनना चाहते थे... तो मुझे कौन सी शर्म आ जायेगी ! मैंने भी बोल दिया की कुछ नंबर जोड़-घटा रहा था और अपनी थोडी बचपन से आदत है... जोड़-घटाव करता हूँ तो उन्हें गुनगुना भी लेता हूँ ! ये गुनगुना लेने वाली बात उन्हें कुछ हजम नहीं हुई और उनके चेहरे के भाव से ऐसा लगा की अपच कुछ ज्यादा ही हो गया है... उनके सवाल का संतुष्ट हल उन्हें नहीं मिला, या फिर उन्हें जो मेरे मुंह से सुनना था वो नहीं मिला, या फिर गुनगुनाने वाली बात थोडी भारी हो गई !
मैंने सोचा की अपनी तरफ़ से थोडी दवा-दारु कर दी जाय मैंने कहा देखिये मैं जो गुनगुना रहा था आपको सुनाये देता हूँ: 'पन्द्रह दुनी तीस तियां पैंतालिस चौका साठ पांचे पचहत्तर छक्का नब्बे सात पिचोत्तर आठे बिस्सा नौ पैन्तिसा झमक-झमक्का डेढ़ सौ !'
और मुड़ के फिर अपने डब्बे (कम्प्यूटर को डब्बा कहने की भी आदत है !) की तरफ़ देखने लगा... ऐसे काम करने के बाद सामने वाले का चेहरा देखने में जो मजा आता है वो शायद आप नहीं समझ सकते... वो आश्चर्य मिश्रित हँसी... हँसी मिश्रित उत्सुकता देखने लायक थी, इधर-उधर भी देख रहे थे की किसी और ने सुन तो नहीं लिया... कमाल है ! बोल में रहा हूँ और टेंशन उन्हें हो रही है... इतनी चिंता क्यों मोल लेते हैं लोग? पर इस गुनगुनाने का कमाल देखिये पास ही आके बैठ गए!
बोले: 'ये क्या था?'
मन तो किया की बोलूँ ये तुलसीदास की एक चौपाई है जिसमें कुम्भकर्ण बन्दर-भालुओं की गिनती करता है मजा तो बहुत आता लेकिन पीटने का डर हो तो चुप रह जाने में ही भलाई है !
'देखिये इसे पहाडा कहते हैं, आप जिसे टेबल कहते हैं ना, वही टू वन जा टू वाला, मेरी मुलाकात उससे थोडी देर से हुई उससे पहले से मैं इस दोहे चौपाई वाले को जानता हूँ और अब इस जन्म तो साथ नहीं छूटना इससे !'
वो मुझसे उम्र में बड़े हैं उन्हें लगा की क्यों बच्चे को परेशान करना बोले:
'पढ़ा तो मैंने भी पहाडा ही था लेकिन ऐसे नहीं, ये थोड़ा मस्त है और वैसे भी अब याद कहाँ है... बच्चों को रटाते-रटाते हम भी टेबल वाले हो गए हैं' वैसे ये भूल जाने वाली बात मुझे कुछ जमी नहीं... और इस भूल जाने वाली बात से ही याद आई हमारे दूर के रिश्ते की एक आंटीजी... आज से ३-४ साल पहले वो घर आई तो हिन्दी में बात कर रहीं थी... और उन्होंने कहा कि भोजपुरी तो वो भूल ही गई हैं, बच्चो के साथ रहते रहते अब बोल ही नहीं पाती! मैं उस समय कुछ ज्यादा ही छोटा था खैर उन्हें कुछ बोल तो अभी भी नहीं पाता बड़े रिश्तेदारों के सामने ना बोलने की आदत है अच्छी या बुरी पता नहीं ! बस बोलता ही नहीं :-)
हाँ तो ये बात मेरी समझ में नहीं आती की वो पहली बोली जो बचपन में बोलना सीखा हो, कोई कैसे भूल सकता है? पहाडा तो चलता है... वैसे ये भी थोड़ा कठिन ही लगता है कि पहाडा पढ़ा हो बचपन में और उसकी जगह टेबल ले ले ! भूलना तक तो समझ में आता है पर उसको टेबल से विस्थापित करने वाली बात थोडी मुश्किल लगती है, वैसे पढाते-पढाते सम्भव है...
पर बोली? नई सीख लो चाहे जीतनी... पर पहली बोली भूल जाओ... मेरे गले नहीं उतरती ! कोई ऐसा बोल रहा है तो कोरा झूठ नहीं तो और क्या कहेंगे? क्या आपके साथ ऐसा हो सकता है की आप बचपन से २०-२५ सा तक रोज़ जो बोली बोल रहे हों, उसके लिए बाकी जिंदगी में कभी ऐसा मौका आ जाय कि आपको वो बोलना ही ना आए?
पर ठीक है भोजपुरी वाले हिन्दी और हिन्दी वाले अंग्रेजी बोलने में अपनी बड़प्पन तो मानते ही हैं !
हाँ तो बात थी मस्त पहाडे की... अपनी तो सच्चाई है भाई जितना पढ़ा, जितने प्रोजेक्ट किए दिमाग में जब भी अंक चलते हैं तो भले ऐसे जितना ट्वेंटी-फोर्टी झाड़ता रहूँ अन्दर 'पंद्रह दूनी तीस तियां' ही फिट हो गया है... अब आप बड़ाई मानें या बुराई... पुराना प्रोग्राम है ! पर अब क्या करें, हम तो आए ही दुनिया में ३०-४० साल बाद... साला एक बात नई पीढी से नहीं मिलती :(
हाँ तो ऐसा लगा की अंकलजी को चिडियाघर का कोई प्राणी मिल गया है... बोले की बस एक बार और सुना दो !
अरे हद है ! अब बच्चा तो हूँ नहीं... तब की बात और थी.
वैसे ये काम बचपन में तो खूब किया... तेज होने की यही परिभाषा थी... चलो बेटा बताओ तो 'कितना नवें १०८?' हम तुरत बोलते १२ ... उसके बाद थोड़ा भारी १८-१९ पर.
पर भारी हल्का सब हो जाने के बाद अंत में यहीं आता था... 'अरे पन्द्रह का बड़ा अच्छा सुनाता है ये... आपने सुना है की नहीं?, बेटा एक बार १५ का पहाडा सुना दो' और हम राग भैरवी में तान छेड़ देते... 'पन्द्रह दुनी तीस तियां...'
और फिर 'वाह ! कितना तेज लड़का है !'
यही करके जिंदगी भर तेज कहाना होता तो कितनी आसान होती जिंदगी...
अब फिर से यही आग्रह आ गया तो क्या करता... एक बार फिर सुना दिया:
'पन्द्रह दुनी तीस तियां पैंतालिस चौका साठ पांचे पचहत्तर छक्का नब्बे सात पिचोत्तर आठे बिस्सा नौ पैन्तिसा झमक-झमक्का डेढ़ सौ !' अब सुनाया भी लय में...
अब आया मजेदार सवाल: 'बेटा बाकी सब तो ठीक लेकिन ये झमक-झमक्का क्या है?'
अब क्या बताऊँ इसका जवाब तो मैं भी बहुत दिनों से ढूंढ़ रहा हूँ... इस पहाडे के बाकी संस्करणों में शायद ये शब्द होता भी नहीं है... अब ये दुर्लभ संस्करण लेकर घूम रहा हूँ तो कुछ तो कारण देना ही पड़ेगा... मैंने कहा की ये बस लय बनाने के लिए है, और इसका कोई गणितीय मतलब नहीं है. कुछ ऐसा हुआ होगा की छमक-छमक पायल बज रही होगी किसी की और किसी कवि ह्रदय मास्टर ने छमक-छमक्का जोड़ दिया और फिर बिगड़ के झमक-झमक्का हो गया होगा ! (मैंने उनसे कहा की इसकी व्युत्पति के बारे में ज्यादा जानना हो तो एक हमारे शब्दों के ज्ञानी अग्रज हैं उनसे संपर्क कर लीजिये, अब क्या करूँ इससे ज्यादा सोच पाता तो क्या यही अंक गुनगुनाता?)
प्रसन्न होके चल दिए... 'बहुत अच्छे बेटा!' शायद उन्हें भरोसा हो गया की ऐसा पहाडा पढ़ा हुआ आदमी जोड़-घटाव गुनगुना भी सकता है! अब तो बस डर है की किसी दिन उनके यहाँ चला गया तो... बच्चों के सामने ना गाना पड़ जाय ! और कहीं किसी मीटिंग में ना बोल दें की ओझा बाबू १५ का पहाडा बहुत अच्छा गाते हैं... आप हिन्दी वाले तो फिर भी मेरी मजबूरी पर हंस सकते हैं... किसी फिरंगी के सामने उन्होंने बोल दिया तो उसके तो गले ना उतरनी !
इस बीच दो बड़े लोगों से बात हुई जिन्हें आप सब जानते हैं... न तो उनका परिचय देने की जरुरत है ना उनके विनम्रता की. कई बातों के लिए मैं अक्सर लिखता हूँ की
लिख नहीं सकता... या फिर कह नहीं सकता... तो बस उसी तर्ज पे...
कह नहीं सकता कितनी खुशी हुई... कितना अच्छा लगा. बस फोन पे बात हुई तो औटोग्राफ नहीं ले पाया... आशीर्वाद ही मिल पाया है, और उस पर तो अपना अधिकार है. माँगने की भी जरुरत नहीं. बिना मांगे ये मिला और ढेर सारा स्नेह... विनम्रता और स्नेह शायद आप समझ गए:
समीरजी और
लावण्याजी. बस अब तो नंबर मिल गया है... इसी आशीर्वाद, स्नेह और विनम्रता की दुहाई देकर परेशान करता रहूँगा :-)
~Abhishek Ojha~