Jul 8, 2009

बारिशाना मौसम में शून्य दिमाग !

झम-झम-झम-झम मेघ बरसते हैं सावन के
छम-छम-छम गिरती बूँदें तरुओं से छन के
चम-चम बिजली चमक रही रे उर में घन के
धम-धम दिन के तम में सपने जगते मन के

ऐसे पागल बादल बरसें नहीं धरा पर
जल फुहार बौछारें धारें गिरती झर-झर
उड़ते सोन-बलाक आर्द्र सुख से कर क्रंदन
घुमड़-घुमड़ फिर मेघ गगन में भरते गर्जन

वर्षा के प्रिय स्वर उर में बुनते सम्मोहन
प्रणयातुर शत कीट विहग करते सुख-गायन
मेघों का कोमल तम श्यामल तरुओं से छन
मन में भू की अलस लालसा भरता गोपन

रिमझिम-रिमझिम क्या कुछ कहते बूँदों के स्वर
रोम सिहर उठते, छूते वे भीतर अंतर
धाराओं पर धाराएँ झरतीं धरती पर
रज के कण-कण में तृण-तृण की पुलकावलि भर
पकड़ वारि की धार झूलता है मेरा मन
आओ रे, सब मुझे घेर कर गाओ सावन
इंद्रधनुष के झूले में झूलें मिल सब जन
फिर-फिर आए जीवन में सावन मन-भावन

- सुमित्रानंदन पंत (साभार)

काफी इन्तजार के बाद आखिर बारिश होने ही लगी. उजड़ कर गंजे हो चुके पहाडों पर हरियाली लौटने लगी है. काले-सफ़ेद उमड़ते-घुमड़ते बादल, चमकती बिजली, पहाड़, हरियाली, सडकों पर पड़ती बूंदें... ! अब सुमित्रानंदन पंत ने तरुओं से छनते हुए बूंदों का जिक्र किया. हमें तो बिल्डिंग, सड़कें, नंगे चट्टानों... गाड़ियों और कंक्रीट पर ही बूंदें गिरती दिखाई देती है. कल्पना शक्ति जैसी कोई चीज तो अपने पास है नहीं. फिर भी कंक्रीट और गाड़ियों से टकराती हुई बूंदें भी मनभावन ही लगती हैं.

बारिश से लगाव कब हुआ याद नहीं ! बारिश में भीगने का मन हमेशा करता है. अब जेब में मोबाइल और बटुआ जैसी बाधाएं हो तो भी मन तो करता ही है. पर वो दिन कुछ और ही थे जब बारिश में... घुटने तक पानी पार करते हुए स्कूल के बस्ते को पानी में तैराते हुए घर लौटते ! सेट बोरिस स्कूल का 'बोरिस' कुछ लोगों के लिए रेनकोट होता तो बाकी लोगों के लिए सिर्फ बस्ते को बचाने के काम में आता. और उसके पहले तो बस्ते के नाम पर काठ की एक पटरी हुआ करती जो पानी में मस्त तैरती. शायद तभी से भीगने में मजा आने लगा था. हाँ तब ये कविता नहीं पढ़ी हुई थी पर बुँदे जरूर पत्तों से छन कर गिरती. स्कूल से घर Puneतक बीच में बगीचा ही था कुछ २ किलोमीटर तक. अब डायरेक्ट बुँदे गिरती हैं... छनने का झंझट लगभग ख़त्म हो चला है. सीधे गाडी के शीशे से टकराती हैं. तब जमा हुए पानी में पटरी तैराने में मजा आता, ठीक से याद नहीं कि वो भी इतना ही गन्दा होता जितना सड़क पर जमा पानी जिसे देख कर अब चिढ होती है.

चीजें बड़ी तेजी से बदलती हैं... ! तब बारिश में भीगते हुए और छींटे उडाते हुए दिमाग शून्य हो जाया करता था... बिल्कुल खाली... निशब्द ! बस एक अजीब सा सुकून... आनंद बचा रह जाता. अब भीगने पर भी वो अनुभूति नहीं होती. बीमार हो जाने की चिंता तो अब भी नहीं सताती. पर दिमाग शून्य नहीं हो पाता... अब भीगते हुए... दिमाग में मणिरत्नम की फिल्मों के बारिश के सीन चलते हैं... नायकन का मुंबई की बारिश वाला सीन सबसे ज्यादा. अब 'सिंगिग इन द रेन' याद आता है. नौवी क्लास की हिंदी पुस्तक में पढ़ी सुमित्रानन्दन पंत की ये कविता याद आती है जिसे मैंने बक्से में बंद किया है. पर दिमाग शून्य नहीं हो पाता.

दो दिन पहले रात को करीब ग्यारह बजे रेनकोट में पैक, बाईक से घर लौटते हुए अचानक मूड बदला... बाईक रोकी... रेनकोट समेत मोबाइल और बटुआ पीठ पर लदे बैग में ठूंस दिया और... भीगते हुए लौटा. फिर काफी देर टहलता रहा. उतने समय तक दिमाग ने बूंदों और बरसात के अलावा कुछ और नहीं सोचा ! यानी 'लगभग' शुन्य अवस्था ! वैसे तो समुद्र के किनारे और किसी मनोरम दृश्य वाली पहाड़ी के ऊपर ही ऐसी अवस्था में दिमाग पहुच पाता है जब और कुछ नहीं सोचता. तेज मन भी जैसे रुक जाता है...

'पगला गए हो का बे? बीमार पड़ जाओगे !' ये सुनकर सपना टूटा और आ गया वापस 'अपनी' दुनिया से 'अपनी' दुनिया में. अगली सुबह थोडा गला कुछ ढीला हुआ और थोडी थकान. पर बीमार नहीं पड़ा :) यूँ तो आजकल अक्सर मन करता है भीगने का. पर 'फोर्मल ड्रेस' में घुसा हुआ ऑफिस आ जा रहा इंसान अगर मन की ऐसी बातें मानने लगे तो सिरफिरा कहलायेगा. वैसे कभी-कभी ऐसी लंठई करने का अपना ही मजा है ! वैसे आपको भी बारिश से इतना लगाव है क्या?

~Abhishek Ojha~

38 टिप्पणियाँ:

Arvind Mishra उवाच

पन्त की कविता और आपका ललित लेख मिलजुल कर और मादक बन गए हैं -बारिश कहीं न कहीं हमारी आदिम इच्छाओं को हुलसाती है -क्योंकि वह लाखो साल से हमारे साथ है !

‘नज़र’ उवाच

जी बिल्कुल है वर्षा और वर्षा ऋतु किसे नहीं सुहाती, वैसे बहुत रोचक लेख है।

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नये प्रकार के ब्लैक होल की खोज संभावित

Dhiraj Shah उवाच

खुबसुरत अभिव्यक्ति व रचना

Udan Tashtari उवाच

मुझे तो है जी बारिश से ऐसा ही लगाव!!

हिमांशु । Himanshu उवाच

बारिश का जिक्र, पंत की कविता और आपकी रम्य रचना- सब मिलजुल कर बारिश की बूँदों की मादकता का एहसास तो करा ही रहे हैं । आभार ।

ताऊ रामपुरिया उवाच

पंत जी की रचना के साथ आपका यह आलेख एक मादकता पैदा करता है. ऐसा लगता है कि काली घटाओं के नीचे बैठे हों और सच मे ही बैठे हैं. आज हमारे यहां बहुत काली घटाएं छारही हैं . शायद बरसात आज हो ही जायेगी जमकर.

रामराम.

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` उवाच

पंत जी दादा जी की कविता और ये लेख दोनों ही बहुत पसंद आये अभिषेक भाई :)

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi उवाच

पंत जी की कविता बहुत सुंदर है। आप वाली लंठई करने का मन है, पर बारिश लौट कर तो आए।

डॉ. मनोज मिश्र उवाच

रिमझिम -रिमझिम-रुनझुन -रुनझुन......
अब का, इसके बाद भी पूछेंगे का, कि बारिश कैसी लगती है ,लेकिन मानसून वाली न की भयंकर बिजलियों वाली.

Jyoti उवाच

बूंदें आकाश का संदेश हैं धरती के लिए,
तो मन ऊपर उठता है बारिश में भींग कर,
खोता है शून्य में,
और आनंद मिलता है शून्य का।
धरती की भागदौर से थका मन,
आकाश के शून्य में आनंद पाता है।

धन्यवाद्, आपके शब्दों में भींग कर,
बारिश का मज़ा आया और
कई पंक्तियों में शून्य भी हुआ मैं,
लेखन के सौंदर्य से।

मथुरा कलौनी उवाच

पूरा ही भिगो दिया आपने ।।

Shiv Kumar Mishra उवाच

वाह! वाह! अद्भुत पोस्ट.
और हमारा यही कहना है कि गणितज्ञ कविताई पर उतर आये तो अद्भुत कविता लिखता है.

राज भाटिय़ा उवाच

बहुत सुंदर पंत जी की कविता के संग आप का लेख वाह वाह.
धन्यवाद

ज्ञानदत्त पाण्डेय | Gyandutt Pandey उवाच

मेरा मन बिल्कुल टेंजेंशियल गया। बचपन में एक पुस्तक पढ़ी थी सिंथिया बोल्स (भारत में अमरीकी राजदूत की बेटी) की। वह एक गरीब लड़की को चित्र बनाना सिखा रही थी। लड़की बार बार बुरूश (कूची के लिये) कहती और सिंथिया बार बार बाहर जा कर देखती कि बारिश तो हो नहीं रही है।
दोनो का हाथ भाषा में तंग था!
और इस साल हमारे यहां बारिश का वितान तंग है! :)

रंजना [रंजू भाटिया] उवाच

पन्त जी की कविता बहुत अच्छी है पर यहाँ तो बारिश हो ही नहीं रही है भीगे काइसे ?

Manish Kumar उवाच

बारिश में भीगने और झूमने की कल्पना जितनी रूमानी लगती है सच बताऊँ कि सचमुच का भींगना उतना अच्छा कभी नही लगा।

गौतम राजरिशी उवाच

बारिश में भीगना तो खूब हुआ ही है...यहाँ तो आपकी लेखनी ने अंतर्मन तक को भीगो डाला और उपर से पंत साब की मेरी पसंदीदा कविता..अहा!

ये आपने अलग से रंगीन बक्सा कैसे बनाया इस खास कविता के लिये?

कुश उवाच

अरे यार इधर अपन भी बारिश में झूम लिए

विनीता यशस्वी उवाच

Mujhe bhi barish se itna hi lagaw hai... barish ho aur bheege na... ye to koi baat nahi...

रचना त्रिपाठी उवाच

आपका पोस्ट पढ़ने के बाद एक बार फिर बच्चा बन जाने को जी चाहता है।
बहुत अच्छा लिखा आपने।

डॉ .अनुराग उवाच

कौन पागल होगा .जिसे बारिश से मोहब्बत नहीं होगी...सबके पास एक भीगा यादो का संदूक पड़ा है भाई....

Meenakshi Kandwal उवाच

वाह अभिषेक... अद्भुत :)
आपके इस अनुभव के सौंदर्य बोध को महसूस करने के बाद तो लगता है, भला ऐसा कोई होगा भी जिसे बारिश न भाती हो। बारिश की ख़ूबसूरती में मन डूब सा गया। हर एक शब्द में भावनाओं की बारिश बरसती दिखाई दी।

mehek उवाच

waah baarish ka ye vivaran bhi bahut achha laga,saath hi kavita bhi.

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन उवाच

अगली सुबह थोडा गला कुछ ढीला हुआ और थोडी थकान. पर बीमार नहीं पड़ा :)
मन प्रसन्न हो तो कौन सी बीमारी पास फटक सकती है भला? खुश रहो आबाद रहो, पेरिस रहो या इलाहाबाद रहो! [वैसे एक पढा लिखा नौजवान कवी होने लगे तो यह अच्छे लक्षण नहीं हैं ;)]

जितेन्द़ भगत उवाच

दि‍माग की शून्‍यता का अपना ही महत्‍व है, आपकी बात से जाना। यादों में जाकर मन बि‍न बारि‍श ही झूमने लगा:)

PD उवाच

barish se lagav kise nahi hai ji?? :)

raj उवाच

etna khoobsurati se likha hai lagta tha pad nahi rahe dekh rahe hai mahsoos kar rahe hai...

Suman उवाच

nice

BrijmohanShrivastava उवाच

बीमार हो जाने की चिंता हमें तो सताती है भाई |हां दिमाग शून्य नहीं हो पाता| काश ! हो पाता ||बारिश से लगाव किसे नहीं होता |काले सफ़ेद उमड़ते घुमड़ते बादल चमकती बिजली "घन घमंड नभ गर्जत घोरा ""पहाड़ हरियाली आपकी रचना की तरह सबको अच्छे लगते है

महामंत्री - तस्लीम उवाच
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महामंत्री - तस्लीम उवाच

बारिश में भीगने का आनंद ही कुछ और है।

-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }

योगेन्द्र मौदगिल उवाच

खूबसूरत पोस्ट वो भी पंत जी की कविता के साथ वाह.. बंधुवर वाह....

ओम आर्य उवाच

is sundar rachana ke kya kahane .....uspar warish ko bouchhara ......yaade .......ek sundr kawita.....sahajata se padhawate chale gaye ........bahut hi sundar.....badhaaee swikare

somadri उवाच

barish se lagav bahut hai. par aise profession me hu ki barish se bhigne ke liye taras jati hu...

aapki rachna achchi lagi,




http://som-ras.blogspot.com

Vijay Kumar Sappatti उवाच

baarish se behtar koi aur mausam nahi hai ji .. aapka lekh man ko bhigo gaya .. pant ji kavita aur aapka graphical details bahut man ko bha gaye ji .. badhai ho...

vijay

pls read my new poem "झील" on my poem blog " http://poemsofvijay.blogspot.com

क्रिएटिव मंच उवाच

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सूचना :
कल सवेरे नौ बजे से पहली C.M. Quiz शुरू हो रही है.
आपसे आग्रह है कि उसमें भी शामिल होने की कृपा करें.
हमें ख़ुशी होगी.
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क्रियेटिव मंच

Mrs. Asha Joglekar उवाच

सच कहा आपने कभी कभी ऐसी लंठई का मज़ा लेते रहना चाहिये । बारिश का मौसम जिसे अच्छा न लगता हो वह कोई अरसिक ही होगा वरना तो मिट्टी की सौधी सुगंध,जो पहली बूंदों के साथ ही उठती है बरबस ही आपको दरवाजे पर खींच लाती है । फिर हाथ में बूंदों को लेना फिर थोडा और आगे जाकर फुहारों में भीगना आपके लेख ने सब याद दिला दिया ।

Science Bloggers Association उवाच

Is shamaa ko jalaaye rakkhen.
-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }